CBSE Class 10 Sanskrit Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम् Hindi Translation

Hindi translation of Sanskrit for CBSE Class 10 Sanskrit Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम्

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CBSE Class 10 Sanskrit
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पाठसारः

यह पाठ ‘कुन्दमाला’ नामक पाठ से सम्पादित किया गया है। इस नाटक के रचयिता महाकवि दिङ्नाग हैं।

पाठ का सार इस प्रकार है-

सिंहासन पर श्रीराम आरूढ हैं। तपस्वी वेश में कुश और लव आते हैं। श्रीराम स्नेहवश उन बच्चों को अपने पास बैठने के लिए आमन्त्रित करते हैं। दोनों तपस्वी शिष्टाचारपूर्वक सिंहासन पर बैठने से मना कर देते हैं।

भगवान दोनों बालकों की आकृति और उनके शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार से अत्यधिक प्रभावित हो जाते हैं। वे उनके विषय में विस्तृत जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। दोनों बालकों का नाम तथा उनके वंश के विषय में वृत्त प्राप्त करने के पश्चात् श्रीराम उनके गुरु के विषय में प्रश्न करते हैं। तब उन्होंने बताया कि उनके गुरु भगवान् वाल्मीकि हैं। इसके पश्चात् श्रीराम ने उन बालकों की माता का नाम जानने की इच्छा प्रकट की। बालकों ने बताया कि उनकी माता को ‘देवी’ के नाम से जाना जाता है।

तत्पश्चात् श्रीराम ने उनके पिता के विषय में पूछा। दोनों बालकों ने बताया कि सभी उनके पिता को ‘क्रूर’ नाम से पुकारते हैं। जब वे कोई चंचलता करते हैं तो उनकी माता क्रोधपूर्वक चिल्लाती हैं-अरे, ‘कूर की सन्तान! धृष्टता मत करो।’ यह सब सुनकर श्रीराम को अत्यधिक दुःख होता है। वे उन बालकों से रामायण गाने के लिए आग्रह करते हैं, परंतु समयाभाव से ऐसा न कर सके।

(सिंहासनस्थः रामः । ततः प्रविशतः विदूषकेनोपदिश्यमानमार्गी तापसी कुशलवौ)

विदूषकः – इत इत आर्या।

कुशलवौ – (रामम् उपसृत्य प्रणम्य च) अपि कुशलं महाराजस्य ?

रामः – युष्मद्दर्शनात् कुशलमिव । भवतोः किं वयमत्र कुशलप्रश्नस्य भाजनम् एव, न पुनरतिथिजनसमुचितस्य कण्ठाश्लेषस्य। (परिष्वज्य) अहो हदयग्राही स्पर्शः ।‌ (आसनार्धमुपवेशयति)

उभौ – राजासनं खल्वेतत्, न युक्तमध्यासितुम् ।

राम: – सव्यवधानं न चारित्रलोपाय। तस्मादा-व्यवहितमध्यास्यतां सिंहासनम् ।(अङ्कमुपवेशयति)

उभौ – (अनिच्छा नाटयतः) राजन्! अलमतिदाक्षिण्येन।
अनुवाद-(श्रीराम सिंहासन पर आसीन हैं। तब विदूषक के द्वारा उपदेश किए जाते हुए तापस कुश और लव प्रवेश करते हैं)

विदूषक :- आर्य, इधर-इधर।

कुश और लव – (राम के समीप जाकर और प्रणाम करके) क्या महाराज कुशल हैं?

राम – आपका दर्शन पाकर कुशल हैं। क्या हम कुशल प्रश्न के ही पात्र हैं तथा अतिथि लोगों के लिए उचित गले मिलने के क्या पात्र नहीं हैं? (आलिंगन करके) अहो! कितना हृदय को मोह लेने वाला स्पर्श है। (आधे आसन पर बैठाता है)

दोनों – यह निश्चय ही राजा का आसन है (इस पर) बैठना उचित नहीं है। रुकावट के साथ, चरित्र लोप के लिए नहीं। अतः गोद से व्यवहित सिंहासन पर बैठिए। (गोद में बैठाता है)

दोनों – (अनिच्छा को प्रकट करते है) राजन्! इतनी उदारता से बस करो।


रामः – अलमतिशालीनतया। भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद् गुणमहतामपि लालनीय एव।

ब्रजति हिमकरोऽपि वालभावात्।

पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम्॥

रामः – एष भवतोः सौन्दर्यावलोकजनितेन कौतूहलेन पृच्छामि-क्षत्रियकुल-पितामहयोः सूर्यचन्द्रयोः को वा भवतोर्वंशस्य कर्ता?

लव: – भगवन् सहनदीधितिः।

राम: – कथमस्मत्समानाभिजनौ संवृत्तौ?

विदूषकः – किं द्वयोरप्येकमेव प्रतिवचनम्?
अनुवाद-

राम– अधिक शालीनता रहने दो। छोटी अवस्था के कारण बच्चे का लाड़ प्यार महान् गुण वालों को भी करना चाहिए। (जिस प्रकार) बच्चा होने के कारण चन्द्रमा भगवान् शंकर के मस्तष्क पर केवड़े के पुष्प से निर्मित जूड़े के रूप में विराजमान है।

राम – आप लोगों के सौन्दर्य से उत्पन्न जिज्ञासा के कारण पूछ रहा हूँ क्षत्रियकुल के पितामह सूर्य और चन्द्र में आप दोनों के वंश का कर्ता कौन है?

लव – भगवान् सूर्य।

राम – अरे, हमारे ही एक कुल में उत्पन्न होने वाले हो गए हैं।

विदूषक – क्या दोनों का एक ही उत्तर है।


लव: – भ्रातरावावां सोद?

रामः – समरूपः शरीरसन्निवेशः। वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम् ।

लव: – आवां यमलौ।

राम: – सम्प्रति युज्यते। किं नामधेयम् ?

लव: – आर्यस्य वन्दनायां लव इत्यात्मानं श्रावयामि (कुशं निर्दिश्य) आर्योऽपि गुरुचरणवन्दनायाम्……..

कुश: – अहमपि कुश इत्यात्मानं श्रावयामि।

राम: – अहो! उदात्तरम्यः समुदाचारः। किं नामधेयो भवतोर्गुरुः?
अनुवाद-

लव – हम दोनों सहोदर भाई हैं।

राम – शरीर की बनावट एक जैसी है। अवस्था में कोई अंतर नहीं है।

लव – हम दोनों जुड़वा हैं।

राम – अब ठीक है। क्या नाम है?

लव – आर्य की सेवा में ‘लव’ ऐसा अपने आपको कहता हूँ। (कुश की ओर इशारा करते हुए) आर्य गुरु चरणों की सेवा में…………

कुश – मैं अपने आप को ‘कुश’ ऐसा कहता हूँ।

राम – अहो! शिष्टाचार अत्यधिक सुन्दर है। आप लोगों के गुरु का क्या नाम है?


लवः – ननु भगवान् वाल्मीकिः।

रामः – केन सम्बन्धेन?

लवः – उपनयनोपदेशेन

रामः – अहमत्रभवतोः जनकं नामतो वेदितुमिच्छामि।

लवः -न हि जानाम्यस्य नामधेयम् । न कश्चिदस्मिन् तपोवने तस्य नाम व्यवहरति।

रामः – अहो माहात्म्यम्।

कुशः – जानाम्यहं तस्य नामधेयम्।
अनुवाद-

लव – अवश्य ही, महाराज वाल्मीकि।

राम – किस सम्बन्ध के द्वारा।

लव – उपनयन दीक्षा के द्वारा।

राम – मैं आप दोनों के पिता को नाम के द्वारा जानना चाहता हूँ।

लव – इसका नाम नहीं जानता हूँ। इस तपोवन में कोई भी उनके नाम का व्यवहार नहीं करता है।

राम – अहो, महिमा।

कुश – मैं उनका नाम जानता हूँ


रामः – कथ्यताम्।

कुशः – निरनुक्रोशो नाम…

रामः – वयस्य, अपूर्वं खलु नामधेयम्।

विदूषकः – (विचिन्त्य) एवं तावत् पृच्छामि निरनुक्रोश इति क एवं भणति?

कुशः – अम्बा।

विदूषकः – किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था?

कुशः – यद्यावयोर्बालभावजनितं किञ्चिदविनयं पश्यति तदा एवम् अविक्षिपति-निरनुक्रोशस्य पुत्रौ, मा चापलम् इति।

विदूषकः – एतयोर्यदि पितुर्निरनुक्रोश इति नामधेयम् एतयोर्जननी तेनावमानिता निर्वासिता एतेन वचनेन दारको निर्भर्त्सयर्ति।
अनुवाद-

राम – कहिए।

कुश – क्रूर है।

रामः – मित्र, अवश्य ही, नाम अपूर्व है।

विदूषक – (सोचकर) मैं पूछना चाहता हूँ कि ‘क्रूर’ ऐसा कौन कहता है?

कुश – माता।

विदूषक – क्या क्रोध में कहती है अथवा स्वाभाविक रूप से।

कुश – यदि वह हमारे लड़कपन के कारण किसी धृष्टता को देखती है, तब ऐसे फटकारती है-क्रूर के पुत्रों, चंचलता मत करो।

विदूषक – यदि इनके पिता का ‘क्रूर’ नाम है तो उसने इनकी माता को अपमानित किया है तथा घर से निकाल दिया है। इसलिए इस वचन से पुत्रों को धमकाती है।


राम: – (स्वगतम्) थिङ मामेवंभूतम् । सा तपस्विनी, मत्कृतेनापराधेन स्वापत्यमेवं मन्युगभैरतरैनि त्यति ।(सवाष्पमवलोकयति)

राम: – अतिदीर्घः प्रवासोऽयं दारुणश्य। (विदूषकमवलोक्य जनान्तिकम्) कुतूहलेनाविष्टो मातरमनयोनामनी वेदितुमिच्छामि। न युक्तं च स्त्रीगतमनुयोक्तुम्, विशेषतस्तपोवने। तत् कोऽत्राभ्युपायः?

विदूषकः – (जनान्तिकम्) अहं पुनः पृच्छामि। (प्रकाशम्) किं नामधेया युवयोर्जननी?

लव: – तस्याः दे नामनी।

विदूषकः – कथमिव?
अनुवाद-

राम – (मन ही मन) इस प्रकार के मुझ व्यक्ति को धिक्कार है। वह तपस्विनी मुझ द्वारा किए गए अपराध से अपनी सन्तान को इस प्रकार क्रोधपूर्ण वचनों से फटकारती है।(आँसुओं के साथ देखता है)।

राम – अत्यधिक विशाल और क्रूर प्रवास है। (विदूषक को देखकर ओट करके) जिज्ञासा से युक्त मैं इनके नाम से माता को जानना चाहता हूँ। स्त्री के सम्बन्ध में टीका टिप्पणी करना उचित नहीं है। विशेष कर तपोवन में। तब यहाँ क्या?

विदूषक – (ओट में)। मैं पूछता हूँ। (सामने) तुम्हारी माता का नाम क्या है?

लव – उसके दो नाम हैं।

विदूषक – क्या?


लव: – तपोवनवासिनो देवीति नाम्नाह्वयन्ति, भगवान् वाल्मीकिर्वधूरिति ।

राम: – अपि च इतस्तावद् वयस्य!मुहूर्त्तमात्रम्।

विदूषकः – (उपसृत्य) आज्ञापयतु भवान् ।

रामः – अपि कुमारयोरनयोरस्माकं च सर्वथा समरूपः कुटुम्बवृत्तान्तः? (नेपथ्ये) इयती वेला सज्जाता रामायणगानस्य नियोगः किमर्थं न विधीयते?

उभौ – राजन् ! उपाध्यायदूतोऽस्मान त्वरयति।अनुवाद-

लव – आश्रम के निवासी ‘देवी’ नाम से पुकारते हैं तथा महाराज वाल्मीकि ‘वधू’ नाम से।

राम – मित्र, इधर आइए! पल भर।

विदूषक – (पास जाकर) आप आज्ञा दीजिए।

राम – इन कुमारों का और हमारे कुटुम्ब का वृत्तान्त समान है। (नेपथ्य में) इतना समय हो गया है। रामायण गायन का कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है?

दोनों – राजन्! गुरुजी का दूत शीघ्रता कर रहा है।


रामः – मयापि सम्माननीय एव मुनिनियोगः। तथाहि-

भवन्तौ गायन्तौ कविरपि पुराणो व्रतनिधिर्

गिरां सन्दर्भोऽयं प्रथममवतीर्णो वसुमतीम्।

कथा चेयं शलाघ्या सरसिरुहनाभस्य नियतं,

पुनाति श्रोतारं रमयति च सोऽयं परिकरः॥वयस्य! अपूर्वोऽयं मानवानां सरस्वत्यवतारः, तदहं सुहृज्जनसाधारणं श्रोतुमिच्छामि। सन्निधीयन्तां सभासदः, प्रेष्यतामस्मदन्तिकं सौमित्रिः, अहमप्येतयोश्चिरासनपरिखेदं विहरणं कृत्वा अपनयामि । (इति निष्कान्ताः सर्वे)

अनुवाद-

राम – मुझे भी मुनि के कार्य का सम्मान करना चाहिए। क्योंकि- आप दोनों इस कथा के गाने वाले हैं।

तपस्वी, पुरातन मुनि (वाल्मीकि) इस रचना के कवि हैं। पृथ्वी पर प्रथम बार अवतरित होने वाला स्फुट वाणी का यह काव्य है। इसकी कथा विष्णु से सम्बद्ध है। इस प्रकार निश्चय ही यह संयोग श्रोता लोगों को पवित्र करता है तथा आनन्दित करता है।

भाव – भगवान् वाल्मीकि द्वारा निबद्ध पुराणपुरुष की कथा, कुश लव द्वारा श्री राम को सुनायी जानी थी, उसी की सूचना देते हुए नेपथ्य से कुश और लव को बिना समय नष्ट किए अपने कर्तव्य का पालन करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों राम से आज्ञा लेकर जाना चाहते हैं तब श्री राम उपर्युक्त श्लोक के माध्यम से उस रचना का सम्मान करते हैं। मित्र! यह मनुष्यों में सरस्वती का अपूर्व अवतार है। इसलिए मैं सुहृद् लोगों में साधारण उसे सुनना चाहता हूँ। (सभी) सभासदों को बुलाइए। लक्ष्मण को हमारे पास भेजिए। मैं भी इन दोनों के अत्यधिक समय तक बैठने के कारण उत्पन्न थकावट को विहार करके दूर करता हूँ। (सभी निकल जाते हैं)

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